Sunday, May 2, 2010

निरुपमा को न्याय चाहिए

निरुपमा के लिए न्याय पिटीशन पर दस्तखत करें। निरुपमा की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह अपनी मर्जी से शादी करना चाहती थी। वर्णव्यवस्था के पुजारियों ने इस अपराध के लिए उसे मौत की सजा दे डाली। पिटीशन पर क्लिक करें।

Friday, April 9, 2010

सानिया तुमसे शिकायत है..

सानिया कभी तुम्हे सेरेना के सामने कोर्ट में रैकेट थामे देखकर बहुत फक्र हुआ था. उस वक्त फक्र महसूस करने की पहली वजह एक भारतीय होने की वजह से थी. परन्तु ख़ुशी इसलिए भी ज्यादा थी कि सानिया तुम उस तबके से आती हो जहाँ ऐसे कई लोग हैं जो खातूनो को सिर्फ परदे कि चादर में लपेटने कि पैरोकारी करते हैं.
वैसे तुम्हे कौर्ट में देखकर ख़ुशी सिर्फ मुझे ही नहीं बल्कि मेरे जैसे एक अरब से ज्यादा भारतीयों को भी हुई होगी. लेकिन सानिया बीते कुछ दिनों में ऐसा लगा कि तुम हम सबकी शर्मिंदगी की वजह बन रही हो. ऐसा नहीं कि शोएब या किसी पाकिस्तानी से शादी करने के तुम्हारे फैसले से हमें किसी तरह का ऐतराज़ है. तुम्हे अपनी जिन्दगी के हर फैसले करने का हक़ बिलकुल है. पर किसी महिला के जख्म कुरेदकर तुम्हे अपनी खुशियाँ तलाशने का हक़ बिलकुल नहीं है.
अगर तुम्हे पता था कि शोएब ने आयशा से शादी की थी तो तुम शोएब के फरेब की भागीदार क्यों बनी? तुमने क्यों मीडिया के सामने आकर अपनी सहेली और हमवतन आयशा के चरित्र को कटघरे में खड़ा किया? क्या तुम सब जानते हुए भी अनजान थी? अगर सब जानती थी तो तुम्हारे उस दावे का क्या कि 'हम इज्जतदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं'.
मैडम सानिया अब आप बाहर आकार शोएब की पाकीजगी का बखान क्यों नहीं करती? क्या आपने अब मान लिया कि आप शहजादा शोएब कि दूसरी बेगम हैं? अब क्या करेंगी प्यार की मजबूरी क्या न करवा दे. खैर हमारी शिकायत पर आपको गौर करना चाहिए. शादी के लिए मुबारकबाद. दुआ करेंगे कि आयशा की दास्ताँ आपके साथ न दोहराई जाये.

Friday, March 19, 2010

जकात से जागी एक गाँव की किस्मत

पवित्र कुरान में जकात (दान) के महत्व से प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुसलमानों ने दान के माध्यम से ही गांव का कायाकल्प कर दिया है। चाहे सड़कों का निर्माण हो या हैंडपंप की व्यवस्था, बिजली के खंभे लगाना हो या स्कूलों की स्थापना, ये सब कुछ आजमगढ़ जिले के सिराजपुर गांव के लोगों ने जकात के माध्यम से कर दिखाया है।
गांव के मोहम्मद हलीम ने कहा कि अगर हम लोग राजनेताओं और जनप्रतिनिधियों के चक्कर काटते तो गांव में विकास के नाम पर कुछ भी संभव नहीं होता। चंदे के जरिए ही हमने गांव में सड़कों का निर्माण, पेयजल के लिए हैंडपंप, बच्चों के लिए स्कूल सहित अन्य बुनियादी जनसुविधाएं दुरुस्त की है।
बुनियादी जनसुविधाओं के बाद सिराजपुर गांव के लोग अब दान के माध्यम से ही एक पुल का निर्माण कर रहे हैं, जिसका निर्माण हो जाने से आजमगढ़ शहर व अन्य कस्बों से गांव का आवागमन सुगम हो जाएगा।
गांव के पूर्व प्रधान एहसानुल हक कहते हैं कि हम लोग चंदे से धन एकत्रित कर तमसा नदी पर एक पुल का निर्माण कर रहे हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस पुल के निर्माण के लिए हमने करीब 60 लाख रुपये एकत्र कर लिए हैं।
उन्होंने कहा कि पुल के निर्माण का काम शुरू हो गया है। हम लोग उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जिस दिन यह पुल बनकर तैयार हो जाएगा।
ग्रामीणों के मुताबिक करीब 30 मीटर लंबे इस पुल का निर्माण हो जाने के बाद गांव जिला मुख्यालय के साथ-साथ तमसा नदी के उस पार के महत्वपूर्ण कस्बों से सीधा जुड़ जाएगा और आवागमन सुगम हो जाएगा।
ग्रामीण इश्तियाक अहमद कहते हैं कि व्यापार की दृष्टि से भी यह पुल बहुत महत्वपूर्ण होगा। खासकर किसानों और पटरी बाजार पर दुकानें लगाने वाले छोटे व्यापारियों के लिए, जिन्हें अपनी सब्जियों और माल को आजमगढ़ शहर ले जाने के लिए 35 किलोमीटर जाना पड़ता है। पुल बन जाने के बाद उन्हें 15 किलोमीटर की दूरी कम हो जाएगी।
ग्रामीणों के मुताबिक करीब 15 साल पहले गांव की मजलिस में हिस्सा लेने आए मुस्लिम धर्मगुरुओं के सुझ्झाव पर उन्होंने जकात से धन एकत्र कर पीने का पानी, सड़क और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं की पहल की थी।
46 वर्षीय ग्रामीण अब्दुल हन्नान कहते हैं कि हैदराबाद, लखनऊ व अन्य हिस्सों से आने वाले धर्मगुरुओं को खस्ताहाल टूटी सड़कों की वजह से हमारे गांव पहुंचने में बहुत दिक्कतों के सामना करना पड़ा। मजलिस के दौरान उन्होंने ग्रामीणों से जकात के जरिए अपने गांव को खुद विकसित करने की सलाह दी।
धर्मगुरुओं की सलाह मानकर ग्रामीणों ने चंदा एकत्र कर सबसे पहले एक टूटी सड़क की मरम्मत की। धीरे-धीरे जकात से ही गांव का कायाकल्प हो गया।
3000 की आबादी वाले मुस्लिम बाहुल्य सिराजपुर गांव के लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य मुंबई व देश के अन्य शहरों में नौकरी या कोई व्यवसाय करता है। गांव के कुछ परिवारों के लोग तो दुबई में भी नौकरियां करते हैं। इसिलए सभी लोग स्वेच्छा से गांव के विकास में चंदा देते हैं।
IANS

Tuesday, August 25, 2009

जल रही लंका के रावण

पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह अब भाजपा के नहीं रहे। इस दक्षिणपंथी पार्टी ने उन्हें एक झटके में पराया कर दिया। पार्टी की ऐसी बेरुखी का अंदेशा तो भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दी चुके जसंवत को हरगिस नहीं रहा होगा। उन्होंने अपने जज्बातों को बयां करने का अदम्य साहस दिखाया और खिसयाई पार्टी ने उन्हें एक झटके में दूध से मक्खी की माफिक निकाल फेंका।

जसवंत के जेहन में यह चल रहा होगा कि जिस पार्टी के लिए उन्होंने 30 साल दिए उसने उन्हें 30 सेकेंड में ही बेगाना कर दिया। यह बात उन्होंने शिमला में कह भी दी। कभी वाजपेयी के हनुमान करार दिए गए जसवंत अब रावण हैं।

अब बेचारे जसवंत जी क्या करें। उनके राम यानी वाजपेयी जी का अब ‘रामराज’ नहीं रहा जहां वह हनुमान हुआ करते थे। वैसे ·भाजपा के हनुमान रहे जसवंत ऐसा कुछ किया भी नहीं किया जिसे कोई राजनीतिक दल सीधे तौर अनुशासनहीनता मान ले। न तो उन्होंने बंगारू लक्ष्मण की तरह रुपये के पैकेट लिए और नहीं उमा भारती की तरह सीधे अपने नेताओं को लताड़ लगाई। फिर आखिर एक किताब के बिना उन पर कार्यवाही क्यों कर दी गई?

वैसे जसवंत जिस लन्का के रावण बन बैठे, अब उसी में आग लग गयी है। आग लगाने वाले कहीं दूर देश से आए हनुमान नहीं बल्कि अपने ही लोग हैं। अरुण शौरी हों या सुधीन्द्र कुलकर्णी सबकी पूँछ में आग लगी हुई है। अब सम्भव है की जसवंत को रावण बनाकर निकलने वाले लोग ही न इस आग के शिकार हो जायें ।

जो पार्टी सबसे पहले आंतरिक लोकतंत्र की बात करती है वह उस बात को नहीं पचा पाई जिससे उसका सीधे कोई सरोकार नहीं था। महज विचारधारा पर आंच के नाम पर एक कद्दावर नेता की तिलांजलि दे दी गई।

खैर , जसवंत ने उसी सच को बढ़चढ़ कर कह दिया जिसे लोहिया और मौलाना आजाद जैसे नेता पहले ही कह चुके थे। उन्होंने कहीं यह नहीं कहा कि जिन्ना भारत के बंटवारे के लिए जिम्मेदार नहीं थे। हां उन्होंने इसकी सामूहिक जिम्मेदारी की बात जरूर कही है।इतिहास पर बहस न करने की सीख देने वालों को यह सोचना होगा कि विज्ञान में कोई बात परमस्थायी नहीं होती तो फिर अतीत के दस्तावेजों पर बहस क्यों नहीं हो सकती।

सवाल है कि क्या इतिहास में त्रुटियां नहीं हो सकतीं? सबसे अहम बात यह है कि पुस्तक में लेखक का विचार निजी होता है तो उससे पार्टी इतनी आहत क्यों दिखती है?चलिए मान लेते हैं कि जसवंत ने भाजपा की विचारधारा को तार-तार कर दिया है। तो फिर आडवाणी के जिन्ना प्रेम में कौन सा अनुराग छुपा था जिन्हें जसवंत की माफिक कुर्बानी नहीं देनी पड़ी। इसी पार्टी को आडवाणी के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने में पसीने छूट गए थे।

ऐसे में भाजपा जैसी तथाकथित लोकतांत्रिक पार्टियों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या मतलब है। पार्टी यही चाहती है कि उसके साथ जुड़ा हर व्यक्ति अपने विचारों और सोच को कहीं दफन कर दे। जो उसके ·भाए उसी बात को हर जगह व्यक्त किया जाए। जज्बातों के कद्र की कोई बात नहीं। अब ऐसी पार्टी का चिंतन बैठक करना लाजमी लगता है।

Sunday, August 16, 2009

टीम में ‘दीवार’ की वापसी


भारतीय क्रिकेट के महान खिलाड़ियों में शुमार हो चुके राहुल द्रविड़ की टीम में वापसी से साबित भी हो गया कि चयनकर्ताओं की नजर में वह आज भी एक ‘दीवार’ हैं।

चयनकर्ताओं ने मुंबई के युवा बल्लेबाज रोहित शर्मा को बाहर का रास्ता दिखाया और इसके बाद बेंगलुरू के द्रविड़ की टीम में वापसी हुई। उनकी यह वापसी दो वर्षों बाद हुई। उन्होंने 14 अक्टूबर, 2007 को अपना आखिरी मैच खेला था।

द्रविड़ का आखिरी 10 एकदिवसीय मैचों में प्रदर्शन बेहद साधारण ही रहा। उन्होंने अपने आखिरी 10 मैचों में महज 136 रन बनाए जिसमें सिर्फ एक अर्धशतक शामिल था। यही वजह रही कि उन्हें टीम में वापसी के लिए इतना लंबा इंतजार करना पड़ा।

द्रविड़ की वापसी के पीछे एक बड़ी वजह इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में उनका शानदार प्रदर्शन रहा है। टीम में उनकी वापसी को मध्यक्रम में एक मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है। ‘श्रीमान भरोसेमंद’ और ‘मिस्टर कूल’ जैसे कई नामों से पुकारे जाने वाले द्रविड़ के लिए बल्लेबाजी क्रम में तीसरा स्थान सटीक माना जाता है।
आज से 13 साल पहले अंतरास्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखने वाले द्रविड़ मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बाद दूसरे ऐसे भारतीय क्रिकेट हैं जिनके नाम टेस्ट और एकदिवसीय दोनों में 10,000 से अधिक रन दर्ज हैं।

द्रविड़ ने अब तक 333 एकदिवसीय मैचों में 39.49 की बेहतरीन औसत से 10,585 रन बनाए हैं जिसमें 12 शतक और 81 अर्धशतक शामिल हैं। उन्होंने 134 टेस्ट मैचों में 52.53 की औसत से 10,823 रन बनाए है। इसमें उन्होंने 26 शतक भी जड़े हैं।

Wednesday, August 12, 2009

इस्लाम और चार शादी

पिछले दिनों विधि आयोग ने विधि मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें कहा गया है कि एक से अधिक विवाह करना इस्लाम के मूल्यों के विपरीत है। रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि चार शादी करने को लेकर लोग एक तरह की गलतपफहमी के शिकार हैं। इस रिपोर्ट पर भारत के कुछ उलेमा और इस्लामी संघठन अपना विरोध जता रहे हैं।
सवाल यह है कि किसने ये आजादी दे दी कि कोई भी शख्स चार और औरतों पर अपनी हूकुमत चलाएगा। मैं इस वाक्य इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि चार शादी की वकालत करने वाले लोग सिर्फ औरत को सामान के सरीखे देखते हैं और उनका यही मानना होता है कि वे बादशाह हैं और जिसके साथ वे निकाह कर लेंगे वह उनकी गुुलाम हो जाएगी। इसलिए मैं इसे शादी नहीं बल्कि शादी के नाम पर किसी इंसान पर हूकुमत करने की एक प्रक्रिया मानतहंूं।
मैं इतना जरूर मानता हूं कि मुझे किसी उलेमा के माफिक इस्लाम की समझ और जानकारी नहीं है। हां मैं जिस इस्लाम को जानता और मानता हूं उसमें औरतों के लिए पूरा सम्मान और हक है। परंतु हमारे कुछ उलेमा औरतों को मर्दों की तुलना में कम आकंते हैं। ऐसा मेरा अनुभव भी रहा है।
अभी हाल ही एक हाफिज से मेरी मुलाकात हुई। उन्होंने बातों-बातों में कहा कि औरत को हर हाल में अपने मर्द यानी पति के हुक्मों की फरमाबरदारी करनी चाहिए और उसका फर्ज अपने पति की सेवा करना है। मेरा उनसे उलट सवाल था कि क्या मर्द को अपनी बीवी की बात माननी चाहिए या फिर उसे बीबी की खिजमत नहीं करनी चाहिए? क्या ऐसा करना मर्दों के मर्दानगी के खिलाफ है? मेरी इन बातों को सुनकर उन्होंने कहा कि आप औरतपरस्त हैं।
बहरहाल, इस्लाम का हवाला देकर जो लोग चार शादियों की वकालत करते हैं उन्हें जरा पैगम्बर की जिंदगी के हर पहूल पर गौर करना चाहिए। यह बात सबकों मालूम होगी कि जब पैगम्बर ने पहली शादी की तो वह महज 21 साल के थे। उन्होंने पहली शादी उस विधवा से की थी जिसकी उम्र तकरीबन 40 के आसपास थी। सवाल यह कि क्या हमारे ये कुछ उलेमा विधवा विवाह की वकालत करतें हैं या खुद ऐसी कोई पहल करने की हिम्मत करते हैं।
ऐसे कई सारे इस्लाम के पहूल हैं जिनके हवाले से इन तथाकथित मर्दों की तथाकथित मर्दानगी को बखूबी झकझोरा जा सकता है। उनको यह समझना होगा कि ये ही नहीं बल्कि औरतें भी इन पर हूकुमत कर सकती हैं। जहां तक चार शादी की बात है तो इस पहलू पर इन लोगों को अपने ज्ञान को थोड़ा बढ़ाने की जरूरत है।

Monday, August 10, 2009

स्वाइन फ्लू और बचाव


एच1एन1 वायरस जो स्वाइन फ्लू-ए के नाम से जाना जा रहा है आम तौर पर सूअरों पर इसका असर देखा गया है। इससे पीड़ित व्यक्ति को बुख़ार, आलस आना, कफ़ बनना, भूख न लगना, पीठ में दर्द, शरीर में दर्द और कमज़ोरी जैसी शिकायतें होती हैं।


इसके अलावा नाक बहना, गले में ख़राश तथा उल्टी−दस्त की शिकायत भी होती है।एच1एन1 वायरस के शिकार व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ़, सीने या पेट में दर्द और बेहोशी जैसी स्थिति होती है और मरीज़ खुद को असमंजस की स्थिति में पाता है। इसी तरह, पांच साल से कम बच्चों में दूसरे वायरल फ़ीवर की तरह ही देखना चाहिए कि कहीं बच्चे को अचानक तेज़ बुख़ार तो नहीं हुआ या गले में दर्द, सांस लेने में तकलीफ़, शरीर में नीलापन, अत्यधिक बेहोशी जैसी स्थिति और चिड़चिड़ापन तो नहीं है।


शरीर पर रैश दिखना भी स्वाइन फ्लू होने का लक्षण है।अब आपके लिए ये जानना भी ज़रूरी हो जाता है कि स्वाइन फ्लू से बचने के लिए किस तरह की एहतियात बरतने की ज़रूरत है। सबसे पहले तो इससे बचाव के लिए आपको एक खास तरह के मास्क की ज़रूरत होगी। ये एक आम मास्क से अलग है। इसका नाम है एन 95। ये मास्क हवा में फैले कीटाणुओं को फिल्टर कर सकता है।ये म़ॉस्क अस्पताल में जांच के लिए जाते समय या अस्पताल में वेटिंग रूम में पहनना बेहद ज़रूरी है।


इसका अलावा अगर आपने किसी ऐसे व्यक्ति को छुआ है जिसे कफ़ और जुकाम हो तो अपने हाथ ज़रूर धोएं। खाने के पहले और खाने के बाद हाथ धोएं…जिन को सर्दी या ज़ुकाम भी हुआ तो वे कोशिश करें कि सावर्जनिक जगहों पर न जाएं।कोई स्वाइन फ्लू का मरीज़ है तो उसे अलग कमरे में रखें।कई अस्पतालों में मरीज़ों की मदद के लिए लिए हरसंभव कदम उठाए गए हैं.


अगर स्वाइन फ्लू के लक्षण मिलें तो आप दिल्ली के 13 अस्पतालों में जा सकते हैं। कुछ अस्पतालों के नाम इस प्रकार हैं : एयरपोर्ट हेल्थ आफिस, राम मनोहर लोहिया अस्पताल, लोकनायक जयप्रकाश, बाड़ा हिंदू राव अस्पताल, जीटीबी अस्पताल, डीडीयू अस्पताल, पीतमपुरा का बीएम अस्पताल औरर पूर्वी दिल्ली का लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल।


उधर, मुंबई में परेल स्थित कस्तूरबा अस्पताल, घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल, बोरीवली के भगवती अस्पताल, मुलुंड स्थित एमटी अग्रवाल अस्पताल, बांद्रा के भाभा अस्पताल, गोरेगांव के सिद्धार्थ अस्पताल में जांच करवाने मरीज़ जा सकते हैं।


Source : NDTV India