Saturday, April 25, 2009

आजमगढ़ का कामरान


मैं जब आजमगढ़ में था तब वहां नाइट मैच देखने का बहुत शौक था। वहां मेरे कस्बे में नाइट मैच तीन दिनों तक चलता था। हम लोग तीनों दिन यह मैच रात भर जागकर देखते थे। उसी दौरान वहां नवादा गांव की टीम मैच खेलने आया करते थी। उसी टीम में एक गंेदबाज था कामरान खान।
आज वही कामरान महान गेंदबाज शेन वार्न की आंखों के तारे हो गए हैं। कामरान की कामयाबी पर मैं सिर्फ इसलिए नहीं खुश हूं कि वह आजमगढ़ के हैं बल्कि मेरी खुशी इसलिए भी ज्यादा है कि वह मुफलिसी से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचे हैं। उन्हें देखकर तब और भी अच्छा लगता है जब मैं यह सोचता हूं कि मेरे कस्बे के निकट एक खेत में बनी पिच से निकलकर एक लड़का डरबन के मैदान तक जा पहुंचा है।
वैसे आईपीएल की राजस्थान राॅयल्स टीम में कामरान का खेलना किसी सपने के सच होने जैसा जरूर है। मैं आजमगढ़ की सरजमीं पर पैदा हुआ हंू इसलिए पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि वहां हजारों ऐसे लड़के हैं जिनकी आंखों में कामरान जैसे ही सपने पल रहे हैं। अब कामरान ने उनके सपने देखने की ताकत को और भी मजबूत बना दिया है।
मुझे हमेशा इस बात की तकलीफ रहती कि यहां बहुत सारे लोगों के मन में आजमगढ़ की छवि सिर्फ आतंकवाद और अपराध के ईर्द-गिर्द है। कामरान जैसे नौजवानों ने कई मायनों में उस छवि को झुठलाया है और लोगों को मेरे जिले के बारे में फिर से सोचने पर मजबूर किया है।

Wednesday, April 22, 2009

चावेज की नयी चाहत


वेनेजुएला के राष्ट्रपति हुगो चावेज अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा के दीवाने हो हैं. ऐसा लगता ही नहीं की यह वाही चावेज हैं जो कुछ महीनो पहले तक अमेरिका और उसकी नीतिओं को जमकर कोसते थे. हाँ यह बात भी सही है की चावेज साहब उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर ज्यादा बरसते थे.
सवाल यह है की ओबामा के आने से अमेरिका की उन नीतियों में कितना बदलाव आया है जिन पर चवेज आग बबूला रहते थे. अगर गौर करें तो अमेरिका और बुश की विदेश नीति को लेकर ही चावेज ज्यादा आक्रोशित थे. इसके साथ ही एक बात और अहम् है की ओबामा के समय में अमेरिका की विदेश निति में कोई चमत्कारिक बदलाव नहीं है. फिर चावेज को ओबामा इतना क्योँ सुहाने लगे हैं?
क्या चावेज की बुश से कोई व्यक्तिगत खुन्नस थी या फिर ओबामा के व्यक्तित्व पर वह कुछ इस कदर निहाल हो गए हैं की उनको अमेरिका दिल के करीब लगने लगा है. अब कोई हैरत न होगी की चावेज का व्हाइट हाउस तक आना जाना धड़ल्ले से शुरू हो जाये. हम तो यही कहेंगे की सलामत रहे यह नया दोस्ताना..

Friday, April 17, 2009

फिर कब आएंगे



चिट्टी पत्री ख़तो किताबत के मौसम


फिर कब आएंगे?


रब्बा जाने,


सही इबादत के कब मौसम


फिर कब आएंगे?


चेहरे झुलस गये क़ौमों के लू लपटों में


गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में


युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा


इससे बदतर


किसी कयामत के मौसम


फिर कब आएंगे?


हवालात सी रातें दिन कारागारों से


रक्षक घिरे हुए चोरों से बटमारों से


बंद पड़ी इजलास


ज़मानत के मौसम


फिर कब आएंगे?


ब्याह सगाई बिछोह मिलन के अवसर चूके


फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके


लगा अंगूठा कटवा बैठे नाम खेत से


जीने से भी बड़ी


शहादत के मौसम


फिर कब आएंगे?


-- नईम


सौजन्य :http://www.anubhuti-hindi.org/

Thursday, April 9, 2009

जरनैल के जूते का असर


एक निजी अखबार के पत्रकार जरनैल सिंह ने चिदंबरम साहब पर जूता क्या फेंक दिया देश की सियासत में हड़कंप मच गई। कांग्रेस पार्टी पर इस जूते का असर कुछ ज्यादा ही देखा गया। पार्टी जरनैल के जूते का संकेत समझ गई कि यह जूता चिदंबरम साहब पर नहीं बल्कि जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार पर फेंका गया था।
टाइटलर और कुमार का टिकट काटकर पार्टी ने जूते के असर को पुख्ता कर दिया है। लोग कुछ भी कहें एक पत्रकार के जूते ने अपना दम दिखा ही दिया।

Wednesday, March 18, 2009

वरुण गांधी का 'विषैलापन'


वरूण गांधी से जुड़े सीडी प्रकरण पर गौर करें तो इस पर किसी को भी ताज्जुब नहीं करना चहिए। हां थोड़ा आश्चर्य इस बात है कि गांधी-नेहरु परिवार से जुड़ा व्यक्ति इस जुबान में बोल रहा है। वैसे भी वरुण आज जिस सियासी पार्टी में हैं उसका इस तरह की भाषा से पुराना नाता रहा है।
बात अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की नहीं हो रही है। यहां बात उनकी पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी की हो रही है। कभी उत्तर प्रदेश में भाजपा के महारथी रहे कल्याण सिंह की भाषा भी वरुण वाली भाषा थी। नरेंद्र मोदी की भाषा का गवाह भी पूरा देश है।
वैसे यह सवाल बड़ा है कि वरुण को अचानक इतने कट्टर हिंदुत्व की याद कैसे आ गई। इसके पीछे वजहें दो हैं। पहली यह कि वरुण को अपना सियासी ग्राफ बढ़ाना है और दूसरी बात यह कि इसी तरह के हथखंडो से उनकी पार्टी भी फायदा उठाना चाहती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वरुण को अपने मकसद में कामयाबी मिल पाएगी।
कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी यह तल्ख भाषा वाली मेहनत जाया चली जाए। संभावना यह भी है कि उनकी इस जुबान के असल सूत्रधार कहीं उन्हें बीच भंवर न छोड़ दें। ये बातें तो खुद वरुण को ही सोंचनी पड़ेंगी।

Saturday, March 14, 2009

अनुराग कश्यप का जवाब नहीं

निर्देशक अनुराग कश्यप न सिर्फ हटकर फिल्में बनाते हैं बल्कि अपनी फिल्मों में समाज की कड़वी को भी समेटते हैं। इस बात को उन्होंने अपनी नई फिल्म गुलाल से एक बार फिर साबित कर दिया है।

उनकी नई फिल्म गुलाल छात्र राजनीति की कड़वी सच्चाइयों से बखूबी वाकिफ कराती है। इस फिल्म में अनुराग ने अपने बेहतरीन निर्देशन की झलक एक बार फिर पेश की है। राजस्थान के राजपूत समाज और छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म दिलीप सिंह नाम के एक ऐसे युवक की कहानी है जो सियासत और समाज की कड़वी सच्चाइयों से अनजान होता। वह किस तरह से एक भोलीभाली जिंदगी से सियासत के दांवपेंच में फंसता है फिर उससे कैसे निकलता है, इसी को फिल्म में बड़े ही वास्तविक ढंग से दिखाने की कोशिश हुई है।
अनुराग की इस फिल्म के हर किरदार में वास्तविकता की एक झलक मिलती है। सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय करने की कोशिश की है। परंतु अभिनय के लिहाज से यह फिल्म संजीदा कलाकार के के मेनन के कंधों पर टिकी है। फिल्म में बाना नाम का जो किरदार उन्होंने निभाया वह अपने आप में लाजवाब है।

Sunday, March 8, 2009

बापू के देश में माल्या

शराब के कारोबारी विजय माल्या का भला गांधी और गांधीवाद से क्या सरोकार है। यह बात इसलिए उठती है क्योंकि बहुत लोगों को महात्मा गांधी से जुडी धरोहरों को बोली लगाकर खरीदना अच्छा नहीं लगा। इनका तर्क है कि जिस गांधी ने आजीवन शराब के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की आज उन्हीं बापू की धरोहर को शराब के एक कारोबारी ने खरीदा।
आज अगर हमने बापू के कुछ सामानों को अपने देश की अस्मिता औ प्रतिष्ठा से जोड दिया था तो माल्या ने उन सामानों को खरीदकर निश्चित तौर पर उस अस्मिता और प्रतिष्ठा की रक्षा की है।
जहां तक बात गांधी और माल्या के सरोकार की है तो वह एक लंबी बहस का मसला है। बात सच है कि माल्या का गांधीवाद से कोई लेना देना नहीं है लेकिन वे लोग जो गांधी और उनके वसूलों के असल अनुयायी बन रहे हैं क्या वे लोग खुद से यही सवाल करके देख सकते है। सवाल वहीं कि वे किस हद तक वे गांधीवाद से जुडे हैं।
कहने का मतलब साफ है कि गांधी की सिर्फ मौकों पर करने वाले और अपने चंद फायदों के लिए बापू के नाम का बेजा इस्तेमाल करने वालों को कोई हक नहीं है कि माल्या पर बरसें क्योंकि माल्या भी बापू के इसी देश के बाशिंदे हैं।