Saturday, March 14, 2009

अनुराग कश्यप का जवाब नहीं

निर्देशक अनुराग कश्यप न सिर्फ हटकर फिल्में बनाते हैं बल्कि अपनी फिल्मों में समाज की कड़वी को भी समेटते हैं। इस बात को उन्होंने अपनी नई फिल्म गुलाल से एक बार फिर साबित कर दिया है।

उनकी नई फिल्म गुलाल छात्र राजनीति की कड़वी सच्चाइयों से बखूबी वाकिफ कराती है। इस फिल्म में अनुराग ने अपने बेहतरीन निर्देशन की झलक एक बार फिर पेश की है। राजस्थान के राजपूत समाज और छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म दिलीप सिंह नाम के एक ऐसे युवक की कहानी है जो सियासत और समाज की कड़वी सच्चाइयों से अनजान होता। वह किस तरह से एक भोलीभाली जिंदगी से सियासत के दांवपेंच में फंसता है फिर उससे कैसे निकलता है, इसी को फिल्म में बड़े ही वास्तविक ढंग से दिखाने की कोशिश हुई है।
अनुराग की इस फिल्म के हर किरदार में वास्तविकता की एक झलक मिलती है। सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय करने की कोशिश की है। परंतु अभिनय के लिहाज से यह फिल्म संजीदा कलाकार के के मेनन के कंधों पर टिकी है। फिल्म में बाना नाम का जो किरदार उन्होंने निभाया वह अपने आप में लाजवाब है।

Sunday, March 8, 2009

बापू के देश में माल्या

शराब के कारोबारी विजय माल्या का भला गांधी और गांधीवाद से क्या सरोकार है। यह बात इसलिए उठती है क्योंकि बहुत लोगों को महात्मा गांधी से जुडी धरोहरों को बोली लगाकर खरीदना अच्छा नहीं लगा। इनका तर्क है कि जिस गांधी ने आजीवन शराब के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की आज उन्हीं बापू की धरोहर को शराब के एक कारोबारी ने खरीदा।
आज अगर हमने बापू के कुछ सामानों को अपने देश की अस्मिता औ प्रतिष्ठा से जोड दिया था तो माल्या ने उन सामानों को खरीदकर निश्चित तौर पर उस अस्मिता और प्रतिष्ठा की रक्षा की है।
जहां तक बात गांधी और माल्या के सरोकार की है तो वह एक लंबी बहस का मसला है। बात सच है कि माल्या का गांधीवाद से कोई लेना देना नहीं है लेकिन वे लोग जो गांधी और उनके वसूलों के असल अनुयायी बन रहे हैं क्या वे लोग खुद से यही सवाल करके देख सकते है। सवाल वहीं कि वे किस हद तक वे गांधीवाद से जुडे हैं।
कहने का मतलब साफ है कि गांधी की सिर्फ मौकों पर करने वाले और अपने चंद फायदों के लिए बापू के नाम का बेजा इस्तेमाल करने वालों को कोई हक नहीं है कि माल्या पर बरसें क्योंकि माल्या भी बापू के इसी देश के बाशिंदे हैं।

Tuesday, March 3, 2009

'ना पाक' ना


श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर लाहौर हुए हमले ने पाकिस्तान के चेहरे से मासूमियत का नकाब फिर से उतार दिया है. पाकिस्तानी पंजाब सरकार को तो मुंबई पर हमला करने वाले दरिंदो की याद आ गयी. शायद पहले नहीं आयी थी क्यूंकि पहले निशाना लाहौर नहीं था.
कहने का मतलब यह है की पाकिस्तान कब तक पूरी दुनिया की आँखों में धुल झोंकता रहेगा. यह बात सही है किसी श्रीलंका के किसी खिलाडी की जान नहीं गयी. लेकिन जिस तरह से एक मेहमान टीम को बीच सड़क पर रोक कर गोलियां बरसाईं गयीं, वह वाकई खौफनाक था.
अब भी वक्त है की पाकिस्तान की सरकार कुछ ठोस करे नहीं तो इतनी देर हो जायेगी की पाकिस्तान के लिए अपना अस्तित्व बचाना भी मुस्किल हो जायेगा. उसे यह भी सोचना चाहिए अमेरका और चीन कब तक उसके आका बने रहेंगे.


तस्वीर: सौजन्य- बीबीसी

Monday, March 2, 2009

फिजा और चांद के आइने में इस्लाम


हाल में हुए फिजा और चांद मोहम्मद प्रकरण के बाद एक सवाल मन में कौंध रहा है कि इस्लाम को लेकर इस तरह का रवैया क्यों पेश किया जा रहा है। क्यों हरियाणा की सियासत के एक जाना पहचाना नाम अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्लाम का सहारा लेता है। इस पूरे प्रकरण के आइने में एक सवाल और खडा होता है कि किसी मजहब को महज अपने निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कहां तक तक इजाजत मिलनी चाहिए।
चांद मोहम्मद यानी चंद्रमोहन चंद महीने पहले तक एक बेहद रसूखदार पद पर आसीन थे। हरियाणा के उप मुख्यमंत्री के कुर्सी पर आसीन चंद्रमोहन अचानक चांद मोहम्मद बनकर सबके सामने आए और साथ में थीं उनकी नई नवेली पत्नी अनुराधा बाली उर्फ फिजा।
इस पूरे मामले में इस्लाम कहीं न कहीं केंद्र बिंदु में था। यही वजह रही कि मुस्लिम समाज से कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया। एक इस्लामिक संस्था ने तो चांद मोहम्मद के खिलाफ फतवा तक जारी कर दिया।
वैसे दुनिया के किसी भी मजहब या विचारधारा की तरह इस्लाम में इस बात की पूरी आजादी है कि कोई भी इंसान इसमें अपनी आस्था जताने के लिए आजाद है। अगर कोई भी व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार करना चाहता है तो उसे इस बात की पूरी छूट न सिर्फ इस्लामी कानून देते हैं बल्कि हमारे मुल्क का संविधान भी इसकी पूरी-पूरी आजादी देता है। यही वजह है कि चंाद मोहम्मद और फिजा ने बिना किसी रोक-टोक के अपने निजी मकसद के लिए इस्लाम का सहारा लिया।
इस बात को समझना जरुरी है कि आखिर चांद और फिजा ने इतनी आसानी से इस्लाम की कोई जानकारी न होने के बावजूद इसे क्यों अपनाया। दरअसल, फिजा और चांद को इस्लाम में आस्था नहीं थीं बल्कि अपने मकसद में आस्था थी। यह मकसद था शादी करने का और कानून के दायरे साफ तौर पर बाहर निकलने का।
अब तो यह देखना है कि फिजा या चांद कब तक इस्लाम को अपनाए रहते हैं। दोनों के अब तक के रवैये से साफ है कि उनका सिर्फ एक मकसद था जो पूरा हुआ लेकिन उनके सारे वादे और इरादे ने एक दूजे के लिए बल्कि इस्लाम और समाज के नजरिए से भी बेमानी साबित हुए है। उनकी साथ जीने मरने की कसमें चंद दिनों में ही टूट गईं और हर नेकी भरी बातें भी उनके जेहन से दूर हो गईं।
बात सिर्फ चांद और फिजा की नहीं है बल्कि ऐसे कई और लोग भी हैं जो अपने आप को महफूज करने की मकसद से इस्लाम का सहारा लेते हैं। फिल्म अभिनेता धर्मेंद और अभिनेत्री हेमा मालिनी की शादी के फसाने भी कुछ इसी तरह के थे। धर्मेंद्र ने हेमा से शादी करने का इरादा किया तो उनके सामने मजहबी बंधन और कानूनी अडचन आगे आ गई। इससे पीछे छुडाने के लिए इन दोनों ने इस्लाम का सहारा लिया।
सवाल यह है कि क्या इस्लाम को अपनाने वाले की नीयत को नहीं भांपा जाना चाहिए। इस बात पर मुस्लिम जगत के उलेमा इत्तेफाक नहीं रखते। फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना मुफती मोहम्मद मुकर्रम अहमद कहते हैं कि यह लोकतंत्र है और यहां किसी को कोई मजहब अपनाने से नहीं रोका जा सकता। वे कहते हैं कि इस्लाम अगर कोई भी इंसान कुबूल करना चाहता है तो उसे राकने की इजाजत मजहब नहीं देता और किसी की नीयत मापने का पैमाना क्या हो सकता है।
उधर, महिलाओं के अधिकार की लडने वाली आॅल इंडिया महिला मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर कहती हैं कि फिजा और चांद मोहम्मद जैसे लोगों ने इस्लाम को बदनाम करने का काम किया है। उनका कहना है कि चंद्रमोहन यानी चंाद ने न सिर्फ इस्लाम को बदनाम किया बल्कि एक औरत के साथ धोखा कर औरतों की भी बदनाम किया। वह इस पूरे प्रकरण में उलेेमाओं और मुस्लिम रहनुमाओं की खामोशी को भी उचित नहीं मानती।
अब इस्लाम के जानकार और उलेमा कुछ भी कहें लेकिन चांद और फिजा ने जिस मजाकिया अंदाज में इस्लाम की आड में शब्दजाल बुने और देश की मीडिया खासकर टेलीविजन मीेडया ने इस पूरे प्रकरण को दिखाया उसमें कहीं न कहीं इस्लाम और उसके मानने वालों को ठेंस जरूर पहुंची।

Sunday, March 1, 2009

जामिया नगर में भी 'जय हो'


गुलजार साहब और रहमान की 'जय हो' का लोहा सात समुंदर पार वे लोग भी मान गए जो 'जय हो'या यू कहें कि हमारी हिंदी से वाकिफ नहीं हैं। मैं तो कहूंगा कि 'जय हो' देश में मजहबी बाधाओं को भी खंडित कर दिया है। इस बात का मैं गवाह अचानक ही बन गया।


दअसल मैं राजधानी के उस इलाके में रहता हूं जहां शायद ही कोई गैर मुस्लिम बाशिंदा बसर करता हो। बात जामिया नगर की कर रहा हूं। चंद रोज पहले की बात है जब मैं जामिया नगर इलाके के बटला हाउस बाजार में चहलकदमी कर रहा था। उसी दौरान मेरे कानों में 'जय हो' की गूंज सुनाई दी। जो आवाज मुझे सुनाई दे रही थी वह किसी रेडियो, टीवी या म्यूजिक सिस्टम से नहीं आ रही थी बल्कि दो मासूम बच्चे इस गीत को बेहद शिद्दत से गा रहे थे। उसी दिन इसी इलाके के जाकिर नगर में मुझे 'जय हो' गुनगुनाते हुए कुछ बच्चे और दिखे।


इस बात का बखान मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मैं जिस तबके यानी मजहब से ताल्लुक रखता हूं वहां चंद परिवार ही ऐसे होंगे जहां 'जय हो'का गान बेहद ही 'उदारवादी माहौल' में मुमकिन है। पर गुलजार साहब और संगीत के जादूगर रहमान ने इसे हर जगह मुमकिन कर दिखाया है। यह कहना ठीक होगा कि संगीत को भौगोलिक सीमाए ही नहीं वरन मजहबी सीमाएं भी नहीं रोक सकती हैं।

Saturday, February 28, 2009

प्रभाकरन का पटाक्षेप?


अनवारूल हक


भारत के पडोस से दहशत का घना कोहरा अब लगभग छंट चुका है। यह कोहरा लिबरेशन टाइगर्स आफ तमिल ईलम यानी लिटटे का था। अभी यह पूरे विष्वास के साथ नहीं कहा जा सकता कि आतंकवाद का पर्याय लिटृटे पूरी तरह तबाह हो चुका है लेकिन इतना तय है कि वेलुपिल्लई प्रभाकरन के इस ख्ंाूखार संगठन को कोई चमत्कारिक बैषाखी ही सहारा दे सकती है।


अगर लिटटे की दुर्दषा हुई है तो उसका पूरा श्रेय श्रीलंका की सरकार और वहां की सेना को जाता है। सेना ने तमिल विद्रोहियों के हर किले को भेदते हए उन्हें खात्मे के आखिरी छोर पर पहंुचा दिया है। बस अब श्रीलंकाई सरकार ही नहीं वरन पूरी दुनिया को उसी पल का इंतजार है जब खंूखार प्रभाकरन सेना की गिरफत में होगा।


श्रीलंकाई सेना को जो कामयाबी अब मिली है उसका इंतजार 27 वर्षों से था। आज से तकरीबन ढाई दषक पहले ही प्रभाकरन ने लिटटे जैसे आतकवादी संगठन की बुनियाद रखी थी। इसके बाद से प्रभाकरन और उसके संगठन का जो आतंकी तांडव शुरू हुआ उसनी बर्बादी की ढेरों इबारतें लिख दीं। परंतु षायद अब प्रभाकरन और उसके संगठन के दिन पूरे हो चुके हैं।


श्रीलंकाई सेना ने लिटृटे की राजनीतिक राजधानी किलिनोच्चि पर कब्जा जमा लिया था और अब तमिल विद्रोहियों के आखिरी गढ मुल्लैतिवु को अपने कब्जे में ले चुकी है। जानकारों की माने तो अब लिटृे का अंत हो चुका है। लिटृटे का सरगना प्रभाकरन अपनी जान बचाने के लिए रास्ते तलाष रहा है।


दुनिया में चंद लोग हो सकते हैं जो प्रभारकन के नापाक और अमानवीय मंसूबे को सही ठहराते हैं। लेकिन बहुतायत ऐसे हैं जो प्रभाकरन की दरिंदगी को षायद ही भूल पाएं। खासकर हम भारतीय जिनका एक बेहतरीन नेता इसी प्रभाकरन ने छीन लिया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ही हत्या की वजह से करोडंो भारतीयों के दिल में जो टीस सालों पहले लगी थी वह आज भी बरकरार है।


प्रभाकरन ने वर्ष 1991 में मानव बम का उपयोग करते हुए राजीव की हत्या करवा दी थी। चेन्नई के उच्च न्यायालय पहले ही प्रभारकन को मौत की सजा सुना चुका है। राजीव गांधी की हत्या पर वर्ष 2006 में लिटृटे ने माफी मांगी थीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रभाकरन और उसके संगठन का जुर्म माफी के लायक हैं। इसका उत्तर सर्वथा ना में होगा।


प्रभाकरन और उसके संगठन की कुछ नापाक करतूतों पर गौर करना जंरूरी है। राजीव गांधी की हत्या से अलग भी प्रभारकन ने कई जुर्म किए हैं जिनसे किसी भी आदमी रूह कांप जाए। श्रीलका के पूर्व राष्टपति रणसिंहे प्रमदासा की की हत्या को षायद श्रीलंकावासी कभी भूल न पाएं। एक मई, 1993 को कोलंबों में मानव बम के जरिए प्रभारकन के आतंकवादियों ने प्रेमदासा की निर्मम हत्या कर दी थी।
इसके अलावा लिटटे ने हजारों लोगों को आतंकवादी वारदातों के जरिए मौत के घाट उतार दिया। तमिल संघर्ष के नाम हजारों मासूम बच्चों के हाथों में हथियार थमाने का गुनाहगार भी प्रभाकरन ही है। दुनिया के सभी संगठन और देष भी बार-बार यह कहते रहे कि तमिल विद्रोहियों ने नाबालिगों को बंदूक थमा दिया लेकिन पहले सवाल यह था कि लिटटे पर किसी की नकेल नहीं थी और वह मजबूत भी था। आज हालात बदलें हैं तो इसमें कोई दो राय नहीं कि बडी संख्या में बच्चे हथियार छोडकर समाज की मुख्यधारा में जुडेंगे।


प्रभारकन की गुनाह की पोटली हाल के दिनों में और भी भारी हो गई है। किलिनोच्चि में जब उसे पराजय मिलने लगी तो वह अपने आखिरी गढ मुल्लैतिवु की ओर भागने लगा। लेकिन अपने साथ अपनी आतंकी लष्कर के साथ मासूम नगरिकों को भी लेता चला गया। इसका मतलब यह नहीं था कि वह तमिल नागरिकों से हमदर्दी रखता है। इसका सीधा मतलब यह है कि वह नागरिकों को अपनी ढाल पहले भी बनाता था और आज भी बना रहा है।


अंतर्राष्टीय रेडक्रास समिति ने हाल ही में कहा कि मुल्लैतिवु के जंगलों सैकडो तमिल नागरिक मारे गए हैं और हजारों की संख्या में फंसे हुए हैं। मुल्लैतिवु में नागरिकों के मारे जाने या फंसे होने की वजह भी प्रभारकन और उसके साथी हैं। प्रभारकन और उसके साथी नागरिकों को अपने साथ जंगलों में लेकर इसलिए गए कि श्रीलंकाई सेना का बढता कदम रंक जाएगा। हांलाकि ऐसा नहीं हुआ। कारण भी यही था कि सेना की कार्रवाई में नागरिका भी मारे गए। इसके लिए सेना की भी आलोचना हो रही है।
अब सवाल यह है कि हजारों की हत्या का जिम्मेदार प्रभारकन श्रीलंका में ही है या कहीं भाग गया है। लिटेटे की ओर से पिछले दिनों एक बयान जारी कर कहा गया था कि प्रभारकन श्रीलंका में है। मीडिया की अन्य खबरों में कहा गया है कि प्रभारकन अपने परिवार के साथ समुद्री रास्ते के जरिए इंडोनेषिया भागने की फिराक में है।


श्रीलंकाई सरकार का अपनी सेना का यही आदेष है कि प्रभारकन को जिंदा या मुर्दा पकडा जाए। सेना का कहना है कि प्रभारकन के भागने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए हैं। प्रभारकन को जानने वाले कहते हैं कि प्रभारकन इतनी आसानी से हार नहीं मानने वाला है। उसके संगठन की ओर से भी कहा गया था कि प्रभाकरन का हुक्म हैं कि सेना के गिरपफत में जाने की बजाय उसके साथी उसे गोली मार देंगे।


गौरतलब है कि दुनिया इसी ओर देख रही ंहै प्रभाकरन का आतंकी साम्राज्य अब खत्म होगा और श्रीलंका के तमिलों समेत सभी नागरिक चैन से जी सकेंगे। अगर वाकई ऐसा होता है तो श्रींलका के इतिहास में यह मील का पत्थर साबित होगा। यह बात भारत के सामरिक हित में भी होगी।

Friday, February 27, 2009

मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों?


अनवारूल हक


देश का आम मुसलमान पेसोपेश में है। आज से नहीं बल्कि पिछले साठ वर्षों से है। कभी उसके समर्पण का इम्तहान होता है तो कभी उसको शक के दायरे में खड़ा कर दिया जाता है। कई मौके तो ऐसे भी आते हैं जब सिर्फ और सिर्फ एक मुसलमान को ही अपने भारतीय होने की या पिफर कहें कि भारतीयता की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती मिलती है। इसमें वह मासूम और अपनी ही दुनिया में मशगूल मुसलमान भले ही बेकसूर हो, पर उसको कसूरवार बनाने का जुर्म हो रहा है और ऐसे जुर्म को अंजाम देने वाले भी गैर नहीं, बल्कि उन्हीं में से चंद हैं।


कोई मजहब के नाम पर, कोई जिहाद के नाम पर तो कोई किसी बाहरी ताकत की पफरमानी के नाम पर या तो खुद गुमराह हो जाता है या फिर चंद लोगों को उस रास्ते पर धकेल देता है जो केवल वतनखिलापफी की ओर जाता है। नतीजा कोई और भुगतता है। कभी-कभार तो पूरी कौम जवाबदेह हो जाती है। ऐसे मौके पर मुस्लिम लीडरशिप का असल इम्तहान होता है, लेकिन अफसोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि एक मुसलमान को तो अब तक अपने रहनुमाओं से नाउम्मीदी ही हाथ लगी है।मसला आतंकवाद का हो, कश्मीर का हो, देश के किसी संवेदनशील मुद्दे का हो या पिफर ऐटमी डील का हो, हर जगह मुसलमानों को अलग-थलग करने की शातिराना कोशिश होती है और नतीजतन पूरी कौम पर एक इल्जाम, वह भी देश की मुख्यधरा से अलग होने का, स्वतः ही लग जाता है।


देश के ज्यादातर मसलों पर मुसलमानों को अलग रखकर दृष्टिकोण बनाने का सिलसिला नया तो नहीं है। परंतु एक बात जरूर है कि उनको हमेशा ही देश के दूसरे समुदायों से अलग रखकर तौलने का क्रम मौजूदा दौर ज्यादा बढ़ा है।सवाल कई हैं। सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों है? इसका जवाब तलाशने की कोशश तो की ही जा सकती है। महत्वपूर्ण बात यह भी है आज जब हर जगह वैश्वीकरण और आध्ुनिकता की बयार चल रही तो ऐसे में मुसलमानों के लिए कोई दूसरा मानदंड तो नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। जिस सवाल को यहां खड़ा किया गया है, वह मजहबी तो हरगि”ा नहीं है, सियासी जरूर है। सियासी इसलिए भी है कि मुसलमान भी देश की हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बराबर का भागीदार और वाजिब हकदार है।वास्तविक के धरातल पर तस्वीर दूसरी है। कई बार ऐसा होता है जब देश के मुसलमानों को बाकी देश के साथ नजर आना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मुसलमानों को अलग-थलग रखने की साजिश होती है और ऐसा नजर आने लगता है कि वे देश की अवाम से अलग है।